नई दिल्ली: अपने देश से गद्दारी करने वाले भारतीय एजेंट रबिंदर सिंह की कहानी आप 'जासूस' सीरीज में पढ़ चुके हैं। वह भारतीय एजेंसी में रहते हुए अमेरिका को सूचनाएं भेजने लगा था और जब शक हुआ तो नेपाल के रास्ते अपने आकाओं के पास भाग निकला। इस तरह के 'डबल एजेंट' का यह कोई पहला मामला नहीं है। अमेरिका में भी ऐसे लोग हुए हैं, जो कैश के लिए खुफिया सूचनाएं दुश्मन को देने लगे। जी हां, रूस ने अमेरिका के एक FBI एजेंट को ही सेट कर लिया था। वह डबल एजेंट कैश और हीरों की लालच में देश की सुरक्षा से जुड़ी खुफिया जानकारी रूस को देने लगा। उस सीनियर एफबीआई एजेंट का नाम था रॉबर्ट फिलिप हैनसेन। रॉबर्ट 1976 में एजेंसी में आया था और कई साल तक रूस को सीक्रेट इन्फॉर्मेशन देता रहा। रूसी हैंडलरों ने उसका नकली नाम दे रखा था- रेमॉन गार्सिया। रॉबर्ट को कैश और हीरों का ऐसा चस्का चढ़ा कि वह नौकरी के 10 साल बाद ही देश से गद्दारी करने लगा। हां, उसने 1985 से ही अमेरिका में बैठकर रूस के लिए जासूसी शुरू कर दी थी। वह कई काउंटर इंटेलिजेंस पदों पर रहा। बड़ी से बड़ी गुप्त सूचनाएं उसकी पहुंच में थीं। वह कोड वर्ड में और 'डेड ड्रॉप' का इस्तेमाल कर अपने रूसी आकाओं को जानकारी पहुंचाता था।
डेड ड्रॉप यानी ऐसी जगह जहां कोई किसी से मिलता नहीं था, बस पैकेट छोड़कर चले जाना होता था। कुछ देर में दूसरा शख्स वहां से पैकेट लेकर चला जाता। ऐसी ही तरकीब से अमेरिका का यह एजेंट रूस की KGB और बाद में SVR को सूचनाएं दे रहा था। उसने अपने ही कई एजेंट के बारे में जानकारी दे दी थी, काउंटर इंटेलिजेंस टेक्निक लीक कर दी, दर्जनों की संख्या में अमेरिकी सरकार के दस्तावेज भेज दिए। उसके अनुभव और प्रशिक्षण के चलते किसी को भनक तक नहीं लगी। कई बार उसकी कुछ अलग गतिविधियों से शक हुआ लेकिन कोई इस निष्कर्ष पर नहीं पहुचा कि वह जासूस भी हो सकता है।
रिटायरमेंट से ठीक पहले बड़ा खुलासा
1990 के दशक में एल्ड्रिक एम्स नाम के शख्स की गिरफ्तारी होती है। FBI और सीआईए को तब महसूस हुआ कि खुफिया एजेंसी में ही कोई है जो रूसियों को गुप्त सूचनाएं दे रहा है। एजेंसी ने जांच शुरू की तो एक दिग्गज सीआईए केस ऑफिसर को गलती से पकड़ लिया। दो साल तक जांच चली लेकिन कुछ नहीं मिला। तब तक साल 2000 आ चुका था। अमेरिकी स्पाई रॉबर्ट के बारे में एफबीआई और सीआईए के हाथ कुछ रूसी दस्तावेज लगे। जल्द ही कन्फर्म हो गया कि बात सच है। रॉबर्ट रिटायर होने वाला था ऐसे में जांचकर्ताओं को जल्दी काम पूरा करना था। वे जासूसी करते रॉबर्ट को रंगे हाथ पकड़ना चाह रहे थे। साथ ही पर्याप्त सबूत भी होने चाहिए थे।
उस समय रॉबर्ट विदेश विभाग के फॉरेन मिशन ऑफिस में शीर्ष पद पर था। एफबीआई ने तय किया कि रॉबर्ट का वहां से ट्रांसफर कर मुख्यालय लाया जाए। उसकी जगह स्पेशल एजेंट डॉन सुलीवन को भेजा गया। डॉन को यह काम दिया गया कि रॉबर्ट के ऑफिस छोड़ने से पहले पता लगाएं कि उसके पास कैसे सूचनाएं पहुंचती थीं, वह कैसे काम करता था और किससे मिलता था। पता चला कि रॉबर्ट के ऑफिस में विदेश विभाग के कंप्यूटर तक उसकी पहुंच में थे। वह कुछ ऐसी भी जानकारियां इकट्ठा करता था, जो उसके लिए जरूरी नहीं थीं। वह ऑफिस में बैठकर दरवाजे बंद करके काम करता था जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। (फोटो- lexica एआई)300 जासूस उसके पीछे पड़ गए
रॉबर्ट की तैनाती एफबीआई मुख्यालय में हुई तो उस पर पैनी नजर रखी जाने लगी। उसे एक फर्जी टास्क दिया गया। यह भी बताया गया कि उसे दो साल का एक्सटेंशन मिल गया है और प्रमोट करके सीनियर एक्जीक्यूटिव सर्विस बना दिया गया है। इधर, एफबीआई मुख्यालय में ही एक सीक्रेट ऑफिस बना दिया गया, जहां चारों तरफ से सर्विलांस कैमरे और माइक्रोफोन लगे थे। जनवरी 2001 में उसके असिस्टेंट एरिक ओ नील को रॉबर्ट के मूवमेंट पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। अगले महीने कुल 300 कर्मचारी और एजेंट रॉबर्ट की निगरानी में लग चुके थे। उसके ऑफिस से निकलने और घर पहुंचने की निगरानी करने के बाद साफ हो गया कि वह अब भी रूस का एक्टिव जासूस है। 18 फरवरी 2001 को वह डेड ड्रॉप करने वाला था। उस लोकेशन को एफबीआई ने पहले से घेर रखा था। पैदल ब्रिज पर प्लास्टिक बैग में लपेटे सामान को रखने के बाद जैसे ही रॉबर्ट गाड़ी में वापस आया, उसे अरेस्ट कर लिया गया। जासूसी के 15 मामलों में उसे दोषी ठहराया गया और 10 मई 2002 को उम्रकैद की सजा दे दी गई। FBI ने माना कि अमेरिकी सरकार से संबंधित कुछ बेहद संवेदनशील जानकारियां उसने रूस को देकर देश से गद्दारी की।