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पर्यावरण संरक्षण के लिए भगवान ने लिया कृष्ण अवतार : आचार्य नंदकुमार चौबे

अपडेट Jan 17, 2024 02:52 pm IST
रायपुर। बोरिया खुर्द मोती नगर में आयोजित श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पंचम दिवस की कथा में आचार्य पंडित नंदकुमार चौबे ने कहा जब-जब पृथ्वी पर गौ माता के ऊपर, ब्राह्मणों के ऊपर, संत महात्माओं के ऊपर और वेद शास्त्र सनातन धर्म के ऊपर अत्याचार होता है तब-तब भगवान अनेक रूपों में अवतरित होते हैं और दुष्टों के संघार करके पुनः धर्म की स्थापना एवं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। इसी क्रम में द्वापर युग में भगवान कृष्ण का मथुरा के कारागृह में प्रकट हुए और गोकुल वृंदावन में अनेक सुंदर-सुंदर लीला किये। यमुना में कालिय नाग का निवास करता था और यमुना के पीने योग्य शुद्ध जल को अपने जहर से जहरीला बना दिया था  जिसके कारण वृंदावन के रहने वाले  मनुष्य, पशु ,पक्षी सभी पीड़ित थे। जिससे चिंतित होकर बालकृष्ण ने कालिय नाग का मर्दन करते हुए उन्हें यमुना से बाहर निकाला और जल को शुद्ध एवं पीने योग्य बनाया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने जल का शोधन करके पर्यावरण का संरक्षण किया ।

ब्रजवासी कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा  तिथि को देवराज इंद्र के पूजा करते थे तब भगवान कृष्ण विचार किये की देवराज इंद्र  के पूजा करने के बजाय क्यों न हम गोवर्धन पर्वत का पूजा करें क्योंकि गोवर्धन पर्वत से हमें गौ माता के खाने के लिए हरे हरे घास प्राप्त होता है और बड़े-बड़े आंधी तूफान से भी पर्वत हमारी रक्षा करते हैं इस पर्वत के उपकार के बदले हमें इनकी पूजा करके इनका सम्मान करनी चाहिए, भगवान के इस निर्णय से एक संदेश निकलता है कि हमें स्थानीय  वस्तुओं का, लोगों का सम्मान करनी चाहिए ,उन्हें महत्व देनी चाहिए इसी को कहते हैं  "वोकल फार लोकल" आज हम विदेशियों के ऊपर या बाहरी व्यक्तियों के ऊपर ज्यादा विश्वास करते हुए उन्हें महत्व देते हैं और अपने आसपास के लोगों का उपेक्षा करते हैं अगर हम स्थानीय लोगों को महत्व देंगे तो उनके द्वारा हमें समय-समय पर सहयोग प्राप्त होता रहेगा इसी उद्देश्य से भगवान कृष्ण ने इंद्र पूजा को बंद कर के गोवर्धन की पूजा करने का निर्णय लिया और पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें दिव्या संदेश दिया ताकि हम पर्यावरण संरक्षण के लिए नदी, नाला, पर्वत- पहाड़ ,वन- जंगल सब का रक्षा करें क्योंकि यह सब हमारे जीवन के लिए आवश्यक है ।

आचार्य नंदकुमार चौबे ने  भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणी का विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए बताएं की विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मणी जो बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती थी उनके भाइयों ने श्रीकृष्ण के विरोध करते हुए चेदि देश के राजकुमार शिशुपाल  से विवाह करने का निश्चय किया लेकिन रुक्मणी के द्वारा भगवान  श्रीकृष्ण के लिए पत्र भेजा गया जिसे पढ़कर भगवान कृष्ण रुक्मणी का हरण करके विधि विधान से विवाह संपन्न करायें  । आयोजक परिवार द्वारा  बड़े उत्साह पूर्वक रुक्मणी और कृष्ण का विवाह महोत्सव मनाया गया जिसमें आसपास के कथा  प्रेमियों का अपार भीड़ देखा जा रहा है।

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