दौराने एतिकाफ अल्ला पाक ने इल्मदीन सीखने का मौका अता फ़रमाया और यह बात ज़हन में आई कि सारी दुनिया में ग़फ़लत जहालत और दीन से बेन्याज़ी के हिसान में घिरी हुई है। कुछ तबलीग़ी काम करने का ज़ज्बा पैदा हुआ जब से अच्छा ज़रिआ इल्म दीन की इषाअत समझ में आया। मेरी इस कोषिष से लोग फैज़याब हों और हिदायत पाएं यही मेरी आरजू़ है। इस ज़रिए से अपने ख़ालिक़ की खुषनूदी हासिल करना मक़सद है। अल्लाह तआला हमें दीन की अहमियत पर अमल करने और दूसरों तक पहुंचाने की तौफ़ीक़ अता फरमाएं।
दुआ के मायने पुकारने और बुलाने के हैं यानि अपनी हाजत के लिये अल्लाह तआला को पुकारा जाए ताकि वो उसकी ज़रूरत को पूरा करें।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं अदउनी असतजिबलकुम
तुम मुझे पुकारों में दुआ क़ुबूल करूंगा और फ़रमाते हैं जब पुकारने वाला मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार क़ुबूल कर लेता हूं।
और फ़रमाते हैं लोगों अपने परवरदिगार को गिड़गिड़ाकर और चुपके चुपके पुकारो।
हमारे प्यारे नबी सल. का इरषाद है, दुआ इबादत का मग़ज़ गूदा है दुका करने से अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल होता है अल्लाह तआला के नज़दीक दुआ से ज़्यादा इज़्ज़त वाली कोई चीज़ नहीं है।
अल्लाह तआला दुआ करने वाले से बहुत खुष हेाता है दुआ मोमिन का हथियार और शैतान से बचाव है। दुआ इबादत की जान है। खु़दा से मुलाक़ात का ज़रिआ है दुआ से तक़दीर बदल जाती है।
दुआ के ज़रीए अल्लाह तआला इंसान को एक मुक़ाम से दूसरे मुक़ाम तक पहुंचा देता है।
दुआ बन्दगी है जो बख्षिष के दरवाजे खोल देती है। दुआ माफ़ी को कलम फेर देती है। दुआ में बन्दा महज़ अल्लाह तआला का वास्ता देकर पनाह तलब करता है तो उसको पनाह दी जाती है।
दुआओं की मकबूलयत के लिये नमाज़ की पाबन्दी और अक़ीदे की पुख़्तगी बहुत जरूरी है।
बारगाहे दुआ अलाही में रद्द नहीं की जाती है।
हर दुआ को पूरा करने वाला वाहदहू लाष्री कलहू है इस लिये दुआ इस यक़ीन के साथ की जाए कि दुनिया की लमाम ताक़ते जमा होकर हमें नफ़ा या नुक़सान पहुंचाना चाहंे तो हरगिज़ नहीं पहुंचा सकतीं।
मुषरिक की ज़बान से निकली हुई दुआ कोई तासीर नहीं रखती दुआ हमें अपने मालिके हक़ीक़ी से मांगना है। हमको यह जै़ब नहीं देता कि नोकर किसी और के हों, अपनी हाजतों के लिये फ़रयाद किसी और से करें।
नबी सलललाहो अलैहि वसल्लम का इरषाद है, तुममंे से जिसके लिये दुआ के दरवाजे खोल दिये गए यानि दुआ मांगने की तौफ़ीक़ दे दी उसके लिये रहमत के दरवाजे खोल दिये गए।
जो दुआऐं मांगी जाती हैं, अल्लाह को सब से ज्यादा पसन्द है कि उसमें दुनिया और आखि़रत की आफ़ियत की दुआ मांगी जाए।
दुआ के सिवाएै कोई चीज क़ज़ा यानि तक़दीर के फैसले को रद्द नहीं कर सकती।
दुआ आफ़त और मुसीबत में भी नफ़ा पहुंचाती है जो नाज़िल हो चुकी है उस मुसीबत में भी जो अभी तक नाज़िल नहीं हुई हैं। और बेषक बला नाज़िल होने को होती हैं कि इतने में दुआ उससे जा मिलती है, या क़यामत तक उन दोनों में दुआ से ज़्यादा अल्लाह तआला के यहां किसी चीज़ की वक़अत नहीं जो शख़्स अल्लाह तआला से दुआ नहीं मांगता अल्लाह उससे नाराज़ हो जाता है।
हमारे प्यारे रसूल (सल.) ने अपने सहाबा र. से फ़रमाया के अल्लाह से दुआ मांगने में कोताही न करो, इसलिये कि दुआ करते रहने की हालत में हरग़िज कोई शख़्स किसी नागहानी आफ़त से हलाक नहीं होगा।
जो शख़्स यह चाहे कि अल्लाह तआला उसकी दुआ सख़्तियों और मुसीबत के वक़्त क़ुबूल फ़रमाए उसको यह चाहिये कि वह खुषहाली में भी कसरत से दुआ मांगा करे।
दुआ दीन का सुतून है, मोमिन का हथियार है वह आसमान व ज़मीन का नूर है।
एक क़ौम मुसीबत में गिरफ़्तार थी, हमारे नबी स. ने उसको देखकर फ़रमाया के क्या यह लोग अल्लाह से आफ़ियत के लिऐ दुआ नहीं मांगा करते।
दुआ बज़ाते खुद एन इबादत है, दूसरों के लिये दुआ करना अपने लिये फरिष्तों से वही दुआ करवानी है। जो बन्दा आम मोमिन और मोमिनात के लिये रोज़ कई दफ़ा अल्लाह तआला से माफी और मग़फिरत के लिये दुआ करेगा वो अल्लाह तआला से माफ़ी और मग़फ़िरत की दुआ वो अल्लाह तआला का मक़बूल बन्दा बन जोएगा, जिनकी दुआए कु़बूल होती हैं। और जिनकी बरकत से दुनिया वालों को रिज्क़ मिलता है। यानि इस तरह दुआ करें कि अल्लाह तमाम मुसलमान व मुसलिमात की बख़्शिष और मग़फ़िरत र्फमा जो उनमें हयात हैं और उनकी भी जो उनमें से फ़ौत हो चुके हैं उनकी भी। अपनी दुआएं शुरू करने से पहले यह दुआ करेंकि मक़बूल बन्दों में शामिल करें।
रमज़ान के महीने में हक़ तआला शानाहू ख़ुसूसियत से दुआऐं क़ुबूल फ़रमाते हैं।
रमज़ानुल मुबारक की हर शब में रोज़ मोमिन की एक दुआ ज़रूर क़ुबूल होती है।
इफ़्तार के वक़्त दुआ की मक़बूलियत का ख़ास वक़्त बताया गया है।
हुज़ूर (सल.) का इरषाद है कि तीन आदमियों की दुआएं रद्द नहीं होतीं एक रोजे़दार की इफ़्तार के वक़्त, दूसरे आदिल बादषाह की दुआ तीसरे मज़लूम की, भले ही किसी मसलहत से कुछ देर हो जाए।
दुआओं की एहमियत देखिये के हक़ तआला शानाहू रमज़ान में फरिष्तों को हुक्म फ़रमाते हैं कि रोजेदार की दुआ पर आमीन कहा करो। यानि रमज़ान की दुआओं की खुसुसियत से कुबूल होना साबिजालो किसी गर्ज के लिये दुआ करते हैं, मगर वो क़ुबूल नहीं होती इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वो दुआ कुबूल नहीं हुई, बल्कि दुआओं के कुबूल होने के मायने समझ लेना चाहिए, नबी करीम (सल.) का इरषाद है जब मुलसमान दुआ करता है बषर्ते कि क़तारहमी या किसी गुनाह की दुआ न करें तो हक़ ताला शानाहू के यहां से तीन चीज़ों में से एक ज़रूर मिलती है।
या उसके बदले में उस पर से कोई बुराई मुसीबत हटा दी जाती है या आखि़रत में उसी क़दर सवाब उसके हिस्से में लगा जाता है।
एक हदीस में आया है कि क़यामत के दिन अल्लाह तआला बन्दे को बुलाकर फ़रमाएंगे ऐ मेरे बन्दे मैंने तुझे करने का हुक्म दिया था और उसको क़ुबूल करने का वायदा किया था, तूने मुझसे दुआ मांगी थी वह अर्ज़ करेगा मांगी थी उसपर इरषाद होगा तूने कोई दुआ ऐसी नहीं की कि जिसको मैंने कुबूल नहीं किया हो तूने फ़लां दुआ मांगी थी के फ़लां तकलीफ़ दूर हो जाए मैंने उसको दन्या में परूा कर दिया था और फ़लां ग़म दफ़़अ़ होने की दुआ मांगी थी मगर उसका असर तुझको मालूम नहीं हुआ। मैंने उसके बदले में फ़लां अज्र सवाब तेरे लिये जमा किया।
हुज़ूर (सल.) इरषाद फ़रमाते हैं कि उसे हर हर दुआ याद दिलाई जाएगी उसका दुन्या में पूरा होना या आखि़रात में उसका सवाब अज्र बताया जाऐगा। उस अज्र व सवाब की कसरत को देखकर बन्दा इसकी तमन्ना करेगा कि काष दुन्या में उसकी कोई भी दुआ क़ुबूल नहीं होती कि यहां उसका इस उसका इस कद्र सवाब मिलता। ग़र्ज़ यह कि दुआ निहायत ही अहम चीज़ है। उसकी तरफ़ से ग़फ़लत रखना नुक़सान और खसारे की बात है।
दुआ के जा़हिर में क़ुबूल होने के आषा नहीं दिखे तो बददिल नहीं होना चाहिए। इससे यह भी ज़ाहिर होता है कि अल्लाह तआला बन्दे की ही भलाई पर नज़र फ़रमाते हैं अगर उसके लिए उस चीज़ को अता फ़रमाना मसलेहत होता है तो अता फ़रमाते हैं वरना नहीं यह भी अल्लाह का बड़ा एहसान है कि हम लोग अक्सर अपनी नासमझी से ऐसी चीज़ मांगते हैं जो हमारे नसीब में नहीं होती। रंज की हालत में अपनी औलाद वग़ैरह को बददुआ दे देते है। याद रखें कि अल्लाह के आली दरबार में......लोग ग़ुस्से में अव्वल तो औलाद को बददुआ दे देते हैं जब वो क़ुबूल हो जाती है तो बाद में राते पछताते फिरते हैं। इसका ख़्याल भी नहीं आता कि यह मुसीबत ख़ुद ही अपनी बददुआ से मांगी है।
नबी करीम (सल.) का इरषाद है कि अपनी जानों औलादों अपने माल और ख़ादिमों को बददुआ न दिया करो किसी ऐसे ख़ास वक़्त में हो जाए तो क़ुबूलयत का हो।
हुज़ूर करीम (सल.) का इरषाद है रमज़ान में अल्लाह पाक से मांगना नामुराद नहीं होता। रमज़ान की हर रात में पुकार लगाई जानी है कि कोई मांगने वाला कि उसका सवाल पूरा किया जाए। इसी के साथ पूरा नहीं होने से बाज़ वक़्त दुआ रद्द कर दी जाती है। खास कर हराम गिज़ा की वजह से दुआ रद्द कर दी जाती है। बाज़ परेषान हाल लगातार दुआएं मांगते हैं मगर खाना हराम, पीना हराम लिबास हराम ऐसी हालत में कहां दुआ क़ुबूल हो सकती है। कूफे में एक जमाअत थी कोई हाकिम उन पर मुसल्लत होता उसके लिए बददुआ करते वह हलाक हो जाता, हज्जाज ज़ालिम जब उन पर मुसल्लत हुआ तो उसने इस जमाअत की एक दावत को जब खाने से फ़ारिग़ हो चुके तो उसने कहा अब में इन लोगों की बददुआ से मेहफूज़ हो गया मैंने हराम की रोज़ी उनके पेट में दाखि़ल कर दी।
जो शख़्स एक लुक़मा भी हराम का खाता है 40 दिन तक उसकी इबादत क़ुबूल नहीं होती दुआ भी इबादत है लिहाज़ा वो भी कु़बूल नहीं होती।
दुआ करने वाला बीमार की तरह होता है, बीमार अगर तन्दुरूरती चाहता है तो उसके लिए दवा के साथ -साथ परहेज़ करना और नुक़सान करने वाली चीजों से बचना चाहिए। अगर दवा करता रहा और परहजे़ नहीं किया तो सहतयाबी मुष्किल हो जाएगी।
बकौल शखसे मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की
इसी तरह दुआ करने वाला चाहता कि उसकी दुआ क़ुबूल हो तो दुआओं के शराइत और उनके आदाब को मद्देनज़र रखना होगा। दुआ इख़लास के साथ हो यानि सिर्फ़ अल्लाह तलाआ का ख़्याल दिल वा दिमाग व ज़बान पर हो।
दुआ करने वाला झूट, हसद, फरेब, तकब्बुर कीना, कपट, ग़ीबत, चुग़ली, श्राब नोषी वगै़रह गुनाह करने से बचे। दुआ यह समझकर की जाए, मैरा रब मैरी हर बात को देखता सुनता है। वह मेरे सामने मोजूद है, वो मांगने वालों को मेहरूम नहीं रखता, दुआ रग़बत के साथ की जाऐ ऐसे लेागांें की ख़ुद अल्लाह तारीफ़ करता है। दुआ में अपने गुनाहों का इक़रार और आइन्दा के लिये तौबा करें। अपने नेक कामों का वास्ता देकर दुआ मांगे।
दुआ से पहले दरूद शरीफ पढ़े। उसके बाद अल्लाह तआला की तारीफ बयान करें, इन कलमात में अल्लाह तआला की तारीफ ज्या बयान हुइ है
1. सुबहान कल्ला हुम्मा
2. आलहमदु शरीफ
3. तीसरा कलमा
फिर असमाए आज़म पढे़
तो आयतल कुर्सी
लाइलाहा इल्ला अन्ता सुबहानक इन्नी कुनतु मिनज़्ज़ालिमीन।
दुआ के षुरू और आखि़र में दरूद पढ़े अल्लाह तआला की सिफात और असमाए हसना जिक्र करके दुआ करें।
दुआओं से पहले और दुआओं के बाद दरूद शरीफ पढ़ने की बहुत एहमियत है। दरूद शरीफ़ बगै़र किसी रूकावट के सीधे अर्ष तक पहुंच जाता है अरहमुर राहेमीन से उम्मीद रखते है कि वो अव्वल और आखिर की चीज़ को क़ुबूल करने के साथ बीच की चीज़ हमारी दुआ भी ज़रूर कु़बूल फ़रमाएंगे।
रसूलल्लाह (सल.) ने एक शख्स को दुआ मांगेते हुए सुना उसने अल्लाह तआला की तारीफ की न नबी पर दरूद भेजा, आपने फ़रमाया कि इस शख्स ने जल्दी की फिर आपने उसको अपने पास बुलाया और उससे फ़रमाया कि जब नमाज़ से फ़ारिग़ हो जाओ तो पहले अल्लाह तआला की तारीफ़ बयान करो फिर मुझ पर दरूद भेजो फिर जो चाहो दुआ करो।
दुआ क़िबला रूख़ होकर जैसे अत्ताहय्यातो की हालत में बैठते है उस तरह बैठ कर मांगो। दुआ में अपनी निगाह असमान की तरफ नहीं करें। दुआ में दोनों हाथ कुषदा करे चेहरे और मोढों के मुक़ाबिल हाथ रखकर मांगे। दुआ से फ़राग़त के बाद दोनों हाथों को चेहर पर फैरना चाहिए।......................
आजिज़ी व इनकिसारी से पढ़ी जाए, तो ही असर वाली होती है
जो शख़्स अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकआत नमाज़ पढ़के अल्लाह तआला से कोई दुआ मांगता है तो हक़ ताआला शानाहू वो दुआ क़ुबूल फ़रमाते हैं। खुवाह फ़ौरन हो या किसी मसलेहत की वजह से कुछ देर बाद मगर कु़बूल ज़रूर फ़रमाते हैं। जो शख़्स फ़र्ज नमाज़ अदा करे उसे अल्लाह जल्लषनाहू से दुआ करके आमीन हम्द और दरूद पर ख़त्म करना चाहिए।