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बात बेबाक : राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस की बधाई ..

अपडेट Apr 24, 2023 12:36 am IST
पंचायती राज गांधीजी बोले तो बापू का स्वप्न था हाँ भाई वही बापू जिसके चरखे से आजादी आई थी, अरे हाँ भाई हाँ वही गांधी जिनका चश्मा शासन की योजनाओं में लोगो के रूप में है तो झाड़ू मोदी के पास और टोपी आप के पास है।

गांधी के पंचायती राज के सपने को साकार करने व ग्रामीण विकास में जनता की भागीदारी के मद्देनजर मेहता समिति द्वारा मध्यप्रदेश के समय पंचायती राज का गठन किया गया था । छत्तीसगढ़ गठन के बाद पंचायती राज में कुछ परिवर्तन भी देखने को मिले रहे है शराब बंदी की बाते करते करते सरकारें खुद शराब की व्यापारी बन शराब बेचने में जुट गई । गांधी के पंचायती राज के जरिये राम राज की परिकल्पना इन सात दशकों में चुनावो में दारू , मुर्गा , कंबल , साड़ी , खरीद फरोख्त और लाठी के बीच खो गई । दशको गुजरने के बाद भी पंचायतो की बदहाली के चलते गांधी का सपना आज भी सपना ही है । पंचायतों की बदहाली के लिये महज पंच, सरपंच, सचिव ही जिम्मेदार नही है बल्कि त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के जुड़े सभी तार भी बराबर जिम्मेदार हैं । दारू मुर्गा की पार्टी के बीच वोटो की खरीद फरोख्त के जरिये कुर्सी तक पहुंचे नेता पंचायतों के फंड पर नजरे गड़ाए बैठे है  । प्रशासनिक अमले के अधिकारी , इंजीनियर से लेकर बाबू तक के लिए पंचायते दुधारू गाय बनी हुई है । नेता अफसर के ही अत्याचार कम नही थे कि अब 50 प्रतिशत महिला आरक्षण के बाद सरपंच प्रतिनिधि (ग्रामीणों की आम भाषा में एस पी ) के रूप में एक और हिस्सेदार भी इनकी जमात में सम्मिलित हो गया जिन्हें जनादेश की नहीं अपितु धनादेश की चिंता ज्यादा रहती है । दारू, मुर्गा और जनादेश व धनादेश के बीच फंसे जनप्रतिनिधि बाबू अफसर के साथ साथ मुफ्तखोरी की योजना के आस पास दिखती भीड़ के चलते गांधी के पंचायती राज के जरिये राम राज की परिकल्पना साकार होने में अभी वक्त है ।

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