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एकबार करके देखें ये छोटी सी साधना, जीवन में देखने को मिलेंगे चमत्कार

अपडेट Nov 28, 2022 08:37 pm IST
संयम का स्रोत आत्मसंकल्प है जो भीतर से आता है। अपने जीवन की कहानी हम सब जानते हैं। उसे समय-समय पर दोहराते भी हैं। हर कहानी में सुख होता है तो दुख भी। पीड़ा मौजूद रहती है तो प्रसन्नता भी। कुछ बातें हमें गौरवान्वित करती हैं तो कुछ अवसाद की तरफ धकेल देती हैं। यानी हमारी कहानी में जीवन के सारे पक्ष और रंग होते हैं। लेकिन हम सुनाते वही हिस्सा हैं जो हमें चमकदार साबित करता है, जो सबसे अलग करता है। क्या यह खुद के साथ न्याय है?

हम भूल जाते हैं कि जीवन का अंधेरा पक्ष भी हमें सही रास्ते पर ले जाने में मददगार होता है। इसलिए कहा जाता है कि सुख और दुख, इन दोनों किनारों पर अगर संयम के साथ चलने की आदत बना लें तो जीवन को सही संदर्भों में समझ पाएंगे। हम महापुरुषों की कहानी पढ़कर अभिभूत तो होते हैं लेकिन उनकी तरह जीने से कतराने लगते हैं। इसलिए कि कामयाबी के लिए सौ कष्ट सहने होते हैं। न्याय और अन्याय में फर्क करना पड़ता है। अगर यह रास्ता मंजूर हो तो शायद हमारी आधी मुश्किलें पहले ही दूर हो जाएं। मगर समस्या यह है कि हमें जितनी चिंता अपने सफर को लेकर नहीं होती, उससे ज्यादा दूसरों को गिराने की होती है। हम खुद की कमियों को देखने के पहले दूसरों की खूबियों को कमियों में रूपांतरित करने लगते हैं। अपना पाप, पाप नहीं लगता, अन्य का निष्पाप होना खलने लगता है।
सदियों से एक विराट सवाल खड़ा है कि न्याय-निर्णय करे, वह पवित्रात्मा न्यायमूर्ति कहां है? भ्रष्ट समाज और उसकी व्यवस्था का विरोध करने वाला पूर्ण रूप से अभ्रष्ट व्यक्ति कहां है? समाज, देश और दुनिया जिस दुर्दशा की ओर जा रही है, उसके लिए क्या हम जिम्मेदार नहीं हैं? जैन-परंपरा में आचार को बहुत महत्व दिया गया है। आचार धर्म साधना की बुनियाद है। इसका मूल है संयम। यह प्रश्न उठाता है कि संयम किसका हो? निर्देश मिलता है- हाथ का संयम, पांव का संयम, सारी कर्मेन्द्रियों का संयम, सारी ज्ञानेंद्रियों से होने वाली अनुभूतियों के प्रति होने वाले राग-द्वेषमूलक मानसिक परिणामों का संयम। यह संयम मन, वाणी और कर्म के सारे स्तरों पर होता है। मन के स्तर पर राग-द्वेषात्मक संकल्प-विकल्पों का, वाणी और कर्म के स्तर पर उनकी क्रिया-प्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्तियों का जो हिंसा, परिग्रह, अब्रह्मचर्य, स्तेय व असत्य के रूप में व्यावहारिक स्तर पर होती है।

संयम का स्रोत आत्मसंकल्प है जो प्रज्ञा से निष्पन्न होता है। प्रज्ञा की ज्योति में आत्मसमीक्षण की अनिवार्य परिणति संयम है क्योंकि सारे असंयम का स्रोत प्रज्ञा का अभाव है। संयम का प्रभाव हमारे चेतन या अवचेतन मानस पर दमन के रूप में कभी नहीं पड़ता, अगर पड़ता तो वह संयम नहीं है। महावीर ने कहा है, जिसकी संयम में रति है उसके लिए वह देवलोक की तरह सुखद है। जिसकी अरति है उसके लिए महानरक की भांति है। संयम की आराधना के लिए बाह्य आलंबन के रूप में किसी आत्मज्ञानी संयमी श्रेष्ठ साधक के मार्गदर्शन में निरंतर रहकर उसके निर्देशानुसार जीवन की साधना करते रहने की अपेक्षा है। यह साधना किसी जंगल में नहीं, आम व्यावहारिक जीवन में रहकर की जा सकती है। इसी से हमारा मानस परिवर्तन होगा। यह साधना दरअसल खुद की खोज है, जो अहंकार, छल, जिद, कुसंस्कार का भेदन कर जीने की कला और परोपकारिता सिखाती है।

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